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शुक्रवार, 19 नवंबर 2021

प्रेमी - मन

सुनो, तुम्हारे भीतर जो 
प्रेमी बसता है,
उसे कभी न मरने देना।
जीवन झंझावातों से 
होकर गुज़रेगा।
उनसे लड़कर,
इच्छाओं की बलि चढ़ाकर 
हँस लेते हो,
प्रेमी-मन को कभी-कभी 
हँस लेने देना।
© तनया ताशा  



खिड़की

पूछते हो,
आवाज़ यह कैसी,
क्या टूटा है?

टूटा क्या है! 
सपनों का वह
शहर नहीं था,
काँच का कोई
महल नहीं था।
अरमानों की 
एक खिड़की थी,
जिसपर अपनी 
कोहनी टिकाए
साथ खड़े 
प्रेमी-जोड़े को,
वह जो एक 
मंज़र दिखता था,

वह छूटा हैै!

© तनया ताशा 

गुरुवार, 18 नवंबर 2021

तोहफ़ा

यूँ तो तुमसे जो भी मिला, 
हर सामान सँभाले रखा है।
हमने-तुमने रोका हुआ 
हर लम्हा थामे रखा है।

चुप्पी, सिसकी, तन्हाई का
बर्दाश्त भी जवाँ रखा हैै,
कहीं भूल न जाए हम माज़ी, 
हर ज़ख्म हरा रखा है।

© तनया ताशा 







बुधवार, 10 नवंबर 2021

अनसुनी कोई बात

अनसुनी की गई बात
अक्सर आह-भरी
दिल की बात होती है,
कहनेवाले को बेहद 
अज़ीज़ होती है
अनसुनी की गई बात;
होती है दिन भर की बीती और
थकान से मुक्ति का ज़रिया।

अनसुनी की गई बात
अक्सर आरंभ के 
पहले हो चुका अंत होती है,
गहरे संकोच की पहली
हिम्मत होती है
अनसुनी की गई बात;
या होती है कुछ जोड़े रखने की 
किसी की आखरी कोशिश।

अनसुनी की गई बात 
कहे जाने के बावजूद 
अनकही रह जाती है!

अनकही रह गई बातों को
चुप्पियों में सी दिया जाता है।
सुने जाने की राहत के बिना ही
जीवन जी लिया जाता है।

Ⓒतनया ताशा 




बुधवार, 3 नवंबर 2021

जी सके

कुछ इस तरह जीते हैं हम हर रोज़,
कि एक रोज़ और जी सकें...
आँखों में बचा ख्वाब का कोई टुकड़ा,
चलते जाने की वजह बन सके।
© तनया

सोमवार, 21 जून 2021

हम जो हैं...

हम जो हैं, जैसे हैं,

उस वजह से बहुत कुछ छूटेगा अपना,

कभी जन्मभूमि, कभी कर्मभूमि

कभी यार, दोस्त

और कभी रूह से जुड़े लोग भी 

लेकिन बने रहेंगे हम

हम जो हैं, जैसे हैं...

©️तनया




शुक्रवार, 18 जून 2021

पिता के लिए

तुम्हारे लिए कुछ लिखने की कोशिश  
ब्रह्मांड को शब्दों में समेटने की कोशिश जैसा है। 
समझ नहीं आता कि 
ऐसा क्या लिखूँ कि यह कहना हो जाए कि 
तुम्हारे भीतर अनंत दिखता था बाबा,
तुम्हारे जीवन के छोटे से हिस्से की साक्षी रहकर 
हमने जाना कि संघर्ष के कितने चेहरे होते हैं। 

जीवन-भर अग्नि परीक्षाओं से गुज़रते रहे तुम,
हाँ, तुम्हारी झुर्रियों और बालों की सफ़ेदी  में 
उन लपटों के निशान देखे हैं हमने,
तुम्हारे जीवन से हमने जाना कि  
ईमान और ज़मीर जैसे शब्द बस किताबी नहीं  होते। 
क्या लिखूँ कि यह कहना हो जाए कि 
हमने तुमसे सीखा कि कैसे  
दीप्तिमान होता है चेहरा और व्यक्तित्व, 
यहाँ तक कि जीवन भी ,
अगर ज़मीर बेदाग़ हो। 
और अगर आत्मा को कोई बात कचोटती न हो, 
अगर निष्ठा रही हो जीवन का निचोड़
तो झुर्रियों वाले चेहरे की  मुस्कान में 
सौम्यता भर जाती है,
पल-पल बीमार होते शरीर से भी ओज दमकता है।

ऐसा क्या लिखूँ बाबा, कि कहना हो जाए कि 
तुम्हारी वह कुर्सी, जिसपर बैठकर तुम 
टी.वी. देखा करते थे,
वहाँ से अब टी.वी. तक का फासला 
बहुत बढ़ गया है,
इतना कि स्क्रीन धुँधली  नज़र आती  है। 
क्या लिखूँ कि यह कहना हो जाए कि 
हम जानते हैं कि किस तरह 
तुम्हारे जीवन में त्याग और स्नेह 
सदा एक-दूजे के पर्याय बने रहे,
कि भीतर कहीं बहुत-बहुत गहराई तक 
हमारे अस्तित्व का ज़र्रा- ज़र्रा जानता है कि 
तुम्हारे दिए का कोई प्रतिदान नहीं हो सकता। 

क्या लिखूँ  कि यह कहना हो जाए कि 
तुम्हारी एक-एक याद में तुम्हारा स्नेह 
आज भी महसूस होता है, 
कि तुम चले तो गए हो लेकिन 
हमारे आचरण में, व्यवहार में 
रह गए हो बहुत-सा। 
कैसे यह कहना हो जाए कि 
लोगों की बातों में तुम्हारा ज़िक्र 
आँखों में आँसू  भले ले आए 
लेकिन कानों में मिठास भी घोल जाता है। 
तुम्हारे शांत व्यक्तित्व की गरिमा 
आज भी गौरव है हमारा। 
और सुबह-शाम की चाय में 
जब ज़िक्र छिड़ता है तुम्हारा,
तो चाय की चुसकियाँ लेते 
तुम छविमान हो जाते हो। 


© तनया ताशा