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गुरुवार, 9 दिसंबर 2021

प्रेमिका

हर स्त्री में 

प्रेमिका की 

संभावना होती है

लेकिन हर स्त्री 

प्रेमिका कहाँ हो पाती है?

 

जो स्त्री

प्रेमिका होती है,

वह लीक पर नहीं चल पाती,

न किसी साँचे में ढल पाती है।

 

अगर ढल जाती है  

किसी साँचे में कभी, तो

खाना परोसते हुए भी वह

दिनचर्या की नहीं होती,

घर सँवारते हुए भी

रोज़मर्रा की नहीं होती,  

वह तुम्हें सींचती तो है,

लेकिन तुम्हारी नहीं होती। 

 

वह तुम्हारे भीतर छुपे 

उस प्रेमी की होती है,

जिसने कभी झाँककर 

प्रेम का आश्वासन दिया था। 

 

© तनया ताशा

 


शनिवार, 4 दिसंबर 2021

कमी का असर हमेशा एक-सा नहीं होता...
सामान की कमी से ज़िंदगी हल्की होती है,
और लोगों की कमी से भारी।
© तनया


शुक्रवार, 3 दिसंबर 2021

कहते हैं


अपने ही घर में भटकने वाले, मुझको बंजारा कहते हैं!
जिन्हें नींद नहीं आती रातों में, वे मुझे आवारा कहते हैं!

औरों के शर्त पे जीने वाले, मुझको बेचारा कहते हैं!
जिनके दिल रोशनदान नहीं, वे मुझे अँधेरा कहते हैं!

© तनया

सोमवार, 29 नवंबर 2021

प्रेम यह मेरा

सर्द सुबह में तुम संग
थोड़ा धूप को बुनकर,
नर्म-गर्म उस शॉल को ओढ़े,
हवा के संग उड़ता जाता है।

शाम ढले तो इंद्रधनुष के
रंगों को जेबों में भरकर,
'मटमैला' भी उसमें जोड़कर
तुम तक वापस आ जाता है।

प्रेम यह मेरा, रोज़ तुम्हारी
पेशानी के शिकन मिटाने, 
कानों में संगीत घोलकर 
जीवन को गाना चाहता है।

प्रेम यह मेरा, दिनचर्या की
उमस, थकन और ऊब मिटाने,
शाम की चाय में वक्त रोककर 
खामोशी सुनना चाहता है।

न ठहरों यदि कुछ लम्हों में,
अपने पर बीती साझा करने,
या पंख काट दो भावों के तो 
प्रेम बहुत भारी लगता है।

©तनया ताशा



शनिवार, 27 नवंबर 2021

तुम्हें लगा


तुम्हें लगा, तुम
छोड़ गए हो,
हम दोनों को 
तोड़ गए हो।
सच तो यह है,
बहुत समय से 
साथ तुम्हारे
मैंने खुदको
खोते देखा था,
दूर कहीं
थोड़ा-थोड़ा
जाते देखा था।

तुम्हें लगा, तुम 
रूठ गए थे,
भीतर-भीतर 
टूट रहे थे।
सच तो यह है,
बहुत समय से,
तुमसे नाता
टूट रहा था,
साथ हमारा 
छूट रहा था,
मेरे रूठे-टूटे सपने 
जगह-जगह पर 
बिखर रहे थे। 

मैं आज भी 
खुद को
ढूँढ रही हूँ ,
रूठे सपने 
मना रही हूँ,
बिखरे टुकड़े 
चुन रही हूँ,
जोड़ रही हूँ।

© तनया ताशा











शुक्रवार, 26 नवंबर 2021

मुक्ति

बाँधने देखो 
कितने आयें।
मीठे सपने, 
प्यार की बातें, 
कितने सारे
वादे लायें।

लेकिन जो भी
बाँधने आयें,
सबकुछ लाये, 
प्रेम-सना वह 
डोर न लाए, 
जिससे मेरी  
रूह बंध जाये। 

पागल मन तो 
ढूँढ रहा है,
ऐसा कोई 
बाँधने वाला,
जो बंधन को
मुक्ति बनाये।

© तनया ताशा   

गुरुवार, 25 नवंबर 2021

इतनी-सी बात

हम दोनों की चाहत में,

बस इतनी - सी बात है;

हम एक समय में ज़िन्दा हैं,

बस इतना - ही साथ है,

और इतनी - सी बात है।

© तनया