Popular Posts

बुधवार, 15 दिसंबर 2021

तुम मेरे न होना


तुम बेशक मेरे न होना,
पर किसी शहर के ज़रूर हो जाना,
हो जाना किसी चाय की टपरी के,
जहाँ अक्सर परिचय 
दोस्ती में बदल जाया करता है। 

तुम मेरे भले न होना,
पर किसी रोज़ सावन के हो जाना,
हो जाना पहली बारिश की सौंधी महक के,
'छपाक' की आवाज़ के,
जो आत्मा में प्रेम-सा उतर आता है। 

तुम मेरे ज़रा भी न होना,
पर किसी के इंतेज़ार के हो जाना,
हो जाना अपनी कही बातों के,
और पहले वादे के,
जहाँ से कोई मन सपना बुनने लगता है। 

तुम मेरे कभी न होना,
किसी के साथ एक मकान के हो जाना,
हो जाना ईंटों के,
उसकी बुनियाद के,
जो फिर किसी का घर बन जाता है। 

तुम अपनी कलाई पर बंधी 
घड़ी के भी न होना,
लेकिन कभी 
किसी और के 
वक्त के पाबंद होकर 
मुक्ति को जान लेना। 

Ⓒतनया 

मंगलवार, 14 दिसंबर 2021

तुम दूर से देखो मेरा जीवन


तुम दूर से देखो मेरा जीवन,
कि विश्वास का वह पुल,
ढह चुका है
जो मुझ तक पहुँचता था कभी।  

सालों से मेरे पास जमा पड़े हैं
तमाम लोगों के 
बेशर्म झूठ, 
जिनकी कीमत 
मैंने विश्वास और 
प्रतिबद्धता की क्षमता 
गँवाकर चुकाई है। 

भीतर कहीं पड़ा हो सकता है 
आस्था का कोई अंश,  
हो सकता है कि 
मैं मिल जाऊँ कहीं,
और मेरा सच भी 
पड़ा मिले वहीं। 

सतह पर मगर   
अविश्वास मिलेगा ढेर-सा,
क्योंकि मैंने सालों तक  
तमाम लोगों के 
बेशर्म झूठ जोड़े हैं। 

इसलिए 
तुम दूर से देखो मेरा जीवन। 

© तनया ताशा 





गुज़रते वक्त का असर नज़र पर पड़ता है 
और ज़ख्मों का असर नज़रिये पर।
© तनया


शुक्रवार, 10 दिसंबर 2021

ज़िंदा

ढूँढा जिसको जगह-जगह, पाया उसको कहीं नहीं,
अलबेला वह 'मोह' किसी ख्वाब का बाशिंदा तो नहीं।

झूठ-फरेबी की महफ़िल में, सच्चे दिल का मान नहीं,
बेबाकी पर नाज़ जिसे था, आज वह शर्मिंदा तो नहीं।

जो पहरे लेकर फिरता है, उसका दिल आज़ाद नहीं,
मन-पिंजरे में कैद मगर बेचैन कोई परिंदा तो नहीं।

जो मरा-मरा सा दिखता है, चेहरे पर जिसके नूर नहीं,
समझौतों के बोझ के नीचे, देखो कहीं ज़िंदा तो नहीं।

© तनया

गुरुवार, 9 दिसंबर 2021

प्रेमिका

हर स्त्री में 

प्रेमिका की 

संभावना होती है

लेकिन हर स्त्री 

प्रेमिका कहाँ हो पाती है?

 

जो स्त्री

प्रेमिका होती है,

वह लीक पर नहीं चल पाती,

न किसी साँचे में ढल पाती है।

 

अगर ढल जाती है  

किसी साँचे में कभी, तो

खाना परोसते हुए भी वह

दिनचर्या की नहीं होती,

घर सँवारते हुए भी

रोज़मर्रा की नहीं होती,  

वह तुम्हें सींचती तो है,

लेकिन तुम्हारी नहीं होती। 

 

वह तुम्हारे भीतर छुपे 

उस प्रेमी की होती है,

जिसने कभी झाँककर 

प्रेम का आश्वासन दिया था। 

 

© तनया ताशा

 


शनिवार, 4 दिसंबर 2021

कमी का असर हमेशा एक-सा नहीं होता...
सामान की कमी से ज़िंदगी हल्की होती है,
और लोगों की कमी से भारी।
© तनया


शुक्रवार, 3 दिसंबर 2021

कहते हैं


अपने ही घर में भटकने वाले, मुझको बंजारा कहते हैं!
जिन्हें नींद नहीं आती रातों में, वे मुझे आवारा कहते हैं!

औरों के शर्त पे जीने वाले, मुझको बेचारा कहते हैं!
जिनके दिल रोशनदान नहीं, वे मुझे अँधेरा कहते हैं!

© तनया