हर्ष गदगद प्राण हैं।
आतिथ्य के सौभाग्य का,
हमको विनम्र अभिमान है।
किस तरह से हम जताएँ
आभार अपना पाहुना
खग-विहग के, स्वरों में भी
आनंद का ही गान है।
आरंभ का, और अंत का भी
यह समर्पण लीजिए।
बहुमूल्य अपने समय का
वरदान हमको दीजिए।
प्रणिपात मुद्रा में खड़े हैं
देखिए, चारों दिशाएँ
स्थान अपना कर ग्रहण
कृतार्थ हमको कीजिए।