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गुरुवार, 31 अगस्त 2023

दीप प्रज्ज्वलन

ज्योति की कोई शिखा 
भीतर कहीं जलती रहे। 
प्रज्ज्वलित हो पुण्य सबके 
पाप-पाखंड भस्म हो,
लौ इतनी तीव्र हो कि
राख बन जाए कलुष। 
और इसकी रोशनी में 
कालिमा मिटती रहे।

स्वागत

आगमन से आपके, 
हर्ष गदगद प्राण हैं। 
आतिथ्य के सौभाग्य का,
हमको विनम्र अभिमान है। 
किस तरह से हम जताएँ 
आभार अपना पाहुना 
खग-विहग के, स्वरों में भी 
आनंद का ही गान है। 
 
आरंभ का, और अंत का भी 
यह समर्पण लीजिए। 
बहुमूल्य अपने समय का 
वरदान हमको दीजिए। 
प्रणिपात मुद्रा में खड़े हैं 
देखिए, चारों दिशाएँ 
स्थान अपना कर ग्रहण 

कृतार्थ हमको कीजिए।

सोमवार, 31 जुलाई 2023

साथ का आभार

(देबजानी बनर्जी मैडम को समर्पित)

इस तरह से 
तुम हृदय में 
स्थान धरकर 
जा रहे हो,
कि हमारे 
अश्रु जल भी 
मौन हैं,
बहते नहीं हैं,
रुक गए हैं। 
आर्द्रता भावों में है,
भीगे हुए से 
कंठस्वर हैं। 
हम विवश हैं 
क्योंकि तुमको 
रोक पाएँगे नहीं,
तुम रुकोगे किस तरह?
यह तुम्हारे वश नहीं। 
जाओ किन्तु,
जाते हुए तुम 
साथ का 
आभार ले लो,
और अपने कंठस्वर से 
आशीष का 
वरदान दे दो। 

©️तनया ताशा





शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2023

याद करना आज का दिन

माँग लो आकाश सारा,

पूरी धरती माँग लो,

सृष्टि का कण-कण तुम्हारा,

जिस घड़ी तुम ठान लो। 

माँग लेना तुम किनारा,

मझधार से लेकिन न डरना 

जूझना तब तक कि जब तक 

बन न जाओ खुद सहारा। 


मुश्किलों की राह में भी 

जो अडिग रह पाओ पथ पर 

देखना तुमको मिलेगा 

धैर्य का वरदान भर-भर। 

जब कभी पथ से भ्रमित हो 

लक्ष्य से छूटे निशाना,

याद करना आज का दिन 

और ऐसे सैकड़ों दिन,

सीखा हुआ सब याद करना,

साधना तुम तब निशाना। 


एक दिन ब्रह्मांड के  

सारे रहस्य जान लोगे,

जिस दिशा में तुम बढ़ोगे,

उस दिशा को जीत लोगे,

मुट्ठियों में भींच लेना,

प्राप्य है सब सुख तुम्हारा।  


मान लो कि हैं अंधेरे 

और चतुर्दिक भय के घेरे,

आत्मबल से जीत लेना 

ढूँढना अपने सवेरे। 

सामने जब हो अनिश्चित,

अज्ञात की चिंता से धूमिल 

मन तुम्हारा डगमगाए,

याद करना आज का दिन 

और ऐसे सैकड़ों दिन 

सीखा हुआ सब याद करना,

हल मिलेगा तुमको निश्चित। 


याद रखना,

आगे तुम जितना बढ़ोगे,

ऊँचा तुम जितना उड़ोगे,

उपलब्धियों से दंभ होगा,

प्राप्तियों का मान होगा,

इसलिए अपनी जड़ों को

धरती में मज़बूत रखना।

दुनिया तुम्हें भरमायेगी,

हर घड़ी ललचायेगी,

तुम विनय और शील से

जीत लेना सब प्रलोभन।

याद करना आज का दिन,

और ऐसे सैकड़ों दिन

सीखा हुआ सब याद करना,

और निरंतर बढ़ते जाना।


याद करना आज का दिन,

और ऐसे सैकड़ों दिन।

Ⓒ तनया ताशा




रविवार, 8 मई 2022

कितनी दूर

माँ जब छोड़कर
चली जाती है,
तो कितनी दूर जाती होगी?
मान लो, 
बहुत साल पहले 
छूट गया हो 
माँ का आँचल,
दस, बीस या 
इतने साल
कि गिनने में
वक्त लग जाए,
तो भी कितनी दूर 
गयी होती है माँ?
अगर माँ की 
अलमारी से,
साड़ियों से 
उसकी उलझनें 
झाँकती हो अब भी;
रसोई की गंध में,
सब्ज़ियों की छौंक में अगर
माँ के हाथों का स्वाद 
रह गया हो, 
तो कितनी दूर 
जा पायी होगी माँ?
घर की खिड़कियों 
को ही ले लो,
उनसे आती हवा में,
या कभी 
बारिश के छींटों में सवार होकर 
उसकी ममता 
पहुँच जाती हो अगर,
तो कितना ही सफ़र तय 
कर पायी होगी माँ?
कितनी दूर गयी होगी माँ?
कितनी दूर जा पायी होगी माँ?
तनया ताशा





शनिवार, 30 अप्रैल 2022

असमर्थ हूँ

(पुतुल घोष मैडम को समर्पित)

मैं लिख सकती
तो ज़रूर लिखती,
कह सकती
तो ज़रूर कहती।
संग देखे होते 
यदि उतार-चढ़ाव,
झेले होते यदि 
जीवन के झंझावात
हमने साथ,
जानती होते यदि
तुम्हारे सुख-दुःख,
त्याग और समर्पण,
मोह से बँधे रिश्तों की
कोई खबर,
तो ज़रूर बताती
तुम्हारे जीवन का सार।
छोटे-छोटे अध्यायों को
क्रमबद्ध साझा करती
सबके साथ।
असमर्थ हूँ,
असमर्थ हूँ, इसलिए,
कर जोड़कर
इतनी ही याचना,
इतना ही आवेदन,
बस इतना-सा समर्पण
कि बाद के लिए रखा हुआ
सारा जी लेना,
जो भी 
असम्भव लगता रहा हो,
वह सब पा लेना।
जीना,
खूब जीना,
खुलकर जीना,
टूटकर जीना।
प्रोत्साहन हो ही तुम,
प्रेरणा बन जाना।

©️तनया ताशा

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2022

जाना

‘जाने’ के भी 
कई क़ायदे होते हैं।
तरह-तरह का ‘जाना’
होता है।
उठकर चले ‘जाना’,
थोड़ी देर के लिए ‘जाना’,
लौट आने के लिए ‘जाना’
या हमेशा के लिए चले ‘जाना’।
जाने देने की भी
सैकड़ों रिवायतें होती हैं।
कभी ‘जल्दी लौट आना’ 
कहकर जाने देना।
कभी ‘फिर मिलेंगे’ 
कहकर विदा करना।
या कभी आख़री मुलाक़ात को
दिल के किसी कोने के
हवाले करके
मौन मुस्कान के साथ
अलविदा कह देना।
‘जाना’ जब बेहद
ज़रूरी हो जाता है,
तब रह गए लोगों 
के दिलों में छोड़े निशान से
दुआ निकलती है
जाने वालों के लिए।
‘चले जाना’ 
आसान नहीं होता,
न ही जाने देना 
आसान होता है।
जाने वालों के ज़हन में,
रह गए लोगों की बातों में,
साथ जिए लम्हें,
बने रहते हैं मुद्दतों बाद भी,
हँसी और ठहाकों में।
इसलिए जाते हुए लोगों से 
यह कहना ज़रूरी है कि
अब तक जहाँ रहे,
वहाँ अपना होना 
ज़रूर याद रखना,
हमेशा याद रखना।
Ⓒ तनया ताशा