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सोमवार, 21 जून 2021

हम जो हैं...

हम जो हैं, जैसे हैं,

उस वजह से बहुत कुछ छूटेगा अपना,

कभी जन्मभूमि, कभी कर्मभूमि

कभी यार, दोस्त

और कभी रूह से जुड़े लोग भी 

लेकिन बने रहेंगे हम

हम जो हैं, जैसे हैं...

©️तनया




शुक्रवार, 18 जून 2021

पिता के लिए

तुम्हारे लिए कुछ लिखने की कोशिश  
ब्रह्मांड को शब्दों में समेटने की कोशिश जैसा है। 
समझ नहीं आता कि 
ऐसा क्या लिखूँ कि यह कहना हो जाए कि 
तुम्हारे भीतर अनंत दिखता था बाबा,
तुम्हारे जीवन के छोटे से हिस्से की साक्षी रहकर 
हमने जाना कि संघर्ष के कितने चेहरे होते हैं। 

जीवन-भर अग्नि परीक्षाओं से गुज़रते रहे तुम,
हाँ, तुम्हारी झुर्रियों और बालों की सफ़ेदी  में 
उन लपटों के निशान देखे हैं हमने,
तुम्हारे जीवन से हमने जाना कि  
ईमान और ज़मीर जैसे शब्द बस किताबी नहीं  होते। 
क्या लिखूँ कि यह कहना हो जाए कि 
हमने तुमसे सीखा कि कैसे  
दीप्तिमान होता है चेहरा और व्यक्तित्व, 
यहाँ तक कि जीवन भी ,
अगर ज़मीर बेदाग़ हो। 
और अगर आत्मा को कोई बात कचोटती न हो, 
अगर निष्ठा रही हो जीवन का निचोड़
तो झुर्रियों वाले चेहरे की  मुस्कान में 
सौम्यता भर जाती है,
पल-पल बीमार होते शरीर से भी ओज दमकता है।

ऐसा क्या लिखूँ बाबा, कि कहना हो जाए कि 
तुम्हारी वह कुर्सी, जिसपर बैठकर तुम 
टी.वी. देखा करते थे,
वहाँ से अब टी.वी. तक का फासला 
बहुत बढ़ गया है,
इतना कि स्क्रीन धुँधली  नज़र आती  है। 
क्या लिखूँ कि यह कहना हो जाए कि 
हम जानते हैं कि किस तरह 
तुम्हारे जीवन में त्याग और स्नेह 
सदा एक-दूजे के पर्याय बने रहे,
कि भीतर कहीं बहुत-बहुत गहराई तक 
हमारे अस्तित्व का ज़र्रा- ज़र्रा जानता है कि 
तुम्हारे दिए का कोई प्रतिदान नहीं हो सकता। 

क्या लिखूँ  कि यह कहना हो जाए कि 
तुम्हारी एक-एक याद में तुम्हारा स्नेह 
आज भी महसूस होता है, 
कि तुम चले तो गए हो लेकिन 
हमारे आचरण में, व्यवहार में 
रह गए हो बहुत-सा। 
कैसे यह कहना हो जाए कि 
लोगों की बातों में तुम्हारा ज़िक्र 
आँखों में आँसू  भले ले आए 
लेकिन कानों में मिठास भी घोल जाता है। 
तुम्हारे शांत व्यक्तित्व की गरिमा 
आज भी गौरव है हमारा। 
और सुबह-शाम की चाय में 
जब ज़िक्र छिड़ता है तुम्हारा,
तो चाय की चुसकियाँ लेते 
तुम छविमान हो जाते हो। 


© तनया ताशा























सोमवार, 31 मई 2021

तुम चले जाओगे

(शुभ्रा चक्रवर्ती मैडम को समर्पित)

तुम चले जाओगे ऐसे 
जैसे एक-न- एक दिन 
जाना ही होता है सबको। 
लेकिन जो निशान छोड़ जाओगे 
उन्हें सहेजेंगे हम,
क्योंकि वह्निशिखा-से जलते 
एक पूरे व्यक्तित्व की 
मौजूदगी का मर्म जानते हैं हम,
समझते हैं उसकी कमी का दर्द,
क्योंकि हमने तुम्हें 
मुश्किलों से गुज़रते देखा है 
उनसे गुज़रना। 
हाँ, रुकोगे नहीं तुम,
न ही रुकेगा वक्त । 
और तुमसे सीखा है 
आज को इतिहास बनाता 
कल आएगा,
और कल को आज बनाएगा 
अगला दिन।  
हाँ, रोज़ की तरह ही रोज़ आएगा।
तुम बरकरार रहोगे मगर 
हम सबमें थोड़ा-थोड़ा। 
कोई बात होगी,
और हम कहेंगे-
तुम होते तो कुछ यूँ  कहते,
कुछ वैसे करते 
और संभव लगती मुश्किलें। 
हाँ, तुम चले जाओगे,
तुम्हारी खाली कुर्सी के गिर्द 
यादें रह जाएगी मगर,
रह जाएगा हमारी बातों में 
तुम्हारा जिक्र,
जैसे पहली बारिश के बाद 
माटी की सौंधी महक रह जाती है। 
तुम चले तो जाओगे,
पर रह जाओगे कहीं-कहीं,
थोड़ा-थोड़ा। 

©तनया 




रविवार, 21 अक्टूबर 2018

फिर मिलना

फिर मिलना दोस्त,
मुद्दतों बाद मिलना...
नाराज़गी में मिठास घोली है
अबकी बार,
सालों बाद जब मिलना,
ठहाकों की महफिल में
मुस्कान बनकर मिलना।

फिर मिलना दोस्त,
मुद्दतों बाद मिलना...
रंजिशों के हरफ़ रेत पर खिंचे हैं
अबकी बार,
सालों बाद जब मिलना,
धुली-उजली रेत पर
लहरों के किनारे मिलना...

फिर मिलना दोस्त,
मुद्दतों बाद मिलना।

©तनया ताशा 

रविवार, 9 सितंबर 2018

अनकहा

मेरी स्मृति में
हल्की-सी
धुँधली-सी
कुछ यादें हैं...
यादें क्या,
यादों का भ्रम है दरअसल...
एक आभास है बस...

याद आता है,
तुम्हारा वह पहला स्पर्श,
अंदाज़ा ही है बस,
जब पहली बार तुमने
छुआ होगा,
तब तुम्हारी खुशी,
धड़कनों का बेतहाशा भागना।
और मैं अवाक!
इस नई दुनिया में,
इस पहली छुअन से
इतना जाना पहचाना-सा अहसास!

हर क्षण
कठोर से कठोरतम
वास्तव की ओर बढ़ते मेरे कदम,
और हर कदम पर
तुम्हारे होने का वह कोमल अहसास,
याद आता है...
उन तस्वीरों में कहीं देखा है मैंने,
तुम्हारी उँगलियों को थामे,
गिरते-पड़ते,
मेरी वह चलने की कोशिश।

हँसी आती है,
जब कल्पना करती हूँ,
बुरी नज़र से बचाने को,
मुझे काले टीके से सजाना तुम्हारा...
अनजानों की भीड़ में
तुम्हारी गोद में
सहमकर सिमटना मेरा...

मैं तुमसे दूर होकर भी,
तुम्हारी डाँट,
तुम्हारे आँचल से सनी
रसोई की गंध,
तुम्हारे अहसास को,
अपने साथ चाहती हूँ...
और जब सोचती हूँ तुम्हें,
तुम्हारी हर एक साँस को
अपने साथ पाती हूँ...

माँ,
मैं कहना चाहती हूँ कुछ ऐसा
जिसे कहना
ज़रूरी नहीं समझा जाता,
जो भीतर कहीं
सालों से अनकहा पड़ा हुआ है...
अपनी आँखें बंद करो
और अपने कान मेरे पास लाओ...
सुनो,
बार-बार सुनो,
मैं तुम्हारी बेटी,
तुमसे प्यार करती हूँ...

©तनया

शुक्रवार, 7 सितंबर 2018

কথা দিলাম

বন্ধু, তোমার উদাস দিনে
কি দেবো তা ভেবে না পেয়ে
তোমার মনের ক্লান্তি টাকে,
আপোষ করার ইচ্ছে টাকে,
আমার মনের সাহস দিলাম...

তোমার এখন
গলদঘর্ম গুমোট দুপুর,
নাও, এক পশলা বৃষ্টি দিলাম...
তোমার শরীরে মেজ্মেজে ভাব,
মনের ব্যথা, অনেক কষ্ট....
তাই আর কিছু না,
ভাদ্র মাসের রোদ খাওয়ানো
একটা নীল বালিশ দিলাম...

তোমার মনের অন্ধকারে,
আলোর রাস্তা বন্ধ দেখে,
আমার খোলা জানালা দিলাম....
অনেক লোকের ভিড়ের মাঝে
একা হওয়ার ইচ্ছে টাকে,
নিরিবিলি এক সন্ধে দিলাম...

তোমার রাত্রি জাগা, কালি পরা
অবিশ্রান্ত চোখ দুটোকে,
দু চোখ ভরে ঘুম দিলাম...
তুমি অলস, একা,
মন মরা এই ভাব যে তোমার
তাই, বৃষ্টি ধোয়া অনেকখানি
টাটকা-টাটকা সবুজ দিলাম...

তোমার 'পারছি না' ভাব,
ভাল্লাগেনা'র দিন গুলোকে
একটু কান্না, একটু হাসি,
অনেক দিলাম উত্তেজনা...
ঘুম না আসা, ভাবনা ভরা,
বুক কাঁপানো দুশ্চিন্তার রাত গুলোকে,
একটি প্রেমের গল্প দিলাম....

বন্ধু আমার,
আর কি দেবো...
চাইবে যখন,
থাকব পাশে...
কথা দিলাম...

©তনয়া

कविता में प्रेम

तुम कह देना चाहते हो
सबकुछ कविता में। 
जाने तुम्हारे पास
शब्द ज़्यादा हैं
या 'मैं' कम हूँ !

पर सुनो,
मेरा प्रेम नहीं समाता
कविता में,
पूरे नहीं पड़ते शब्द
व्यक्त करने को
ढाई अक्षरों का आवेग। 

मेरे इस प्रेम में
कुछ है नया-सा,
और पुराना भी;
खाली-सा और
लबालब भरा हुआ भी। 
कोई संगीत है,
एक गाथा है,
जो ख़त्म ही नहीं होना चाहती। 

कविता नहीं बता पाएगी कि
मेरे कठिन हाथों को
तुम्हारे कठिन हाथों का स्पर्श
कैसा लगता है!
क्या है तुम्हारे आँखों की तरलता
और होठों की मासूमियत
मेरे लिए!
क्या है तुम्हारे साथ का होना,
क्या है जीवन का संगीत। 

© तनया ताशा